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राजस्थान में राष्ट्रीय उद्यान/टाइगर प्रोजेक्ट


राष्ट्रीय उद्यान/टाइगर प्रोजेक्ट

रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान
      सवाई माधोपुर के पास रणथम्भौर के चारों तरफ के क्षेत्र में फैला यह राष्ट्रीय उद्यान बाघ संरक्षण स्थल है। यह उद्यान 392 वर्ग किमी. में फैला हुआ है। भारतीय बाघ, बघेरे तथा रीछों को घूमते हुए यहाँ आसानी से देखा जा सकता है। सांभर, चीतल, नीलगाय, मगरमच्छ अनेकों प्रकार के पक्षी यहाँ का अतिरिक्त आकर्षण हैं। ठण्डे मौसम में यहाँ पर्यटन का अच्छा समय माना जाता है। वैसे वर्षा के मौसम में भी यह बहुत सुहावना लगता है।

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान
      यह एशिया में पक्षियों का सबसे बड़ा प्रजनन क्षेत्र है, जो भरतपुर शहर में है। इसको घना के नाम से भी जाना जाता है। इसका क्षेत्रफल 29 वर्ग कि.मी. है, जिसमें 11 वर्ग कि.मी. में झील है इसमें 113 प्रजातियों के विदेषी प्रवासी पक्षी तथा 392 प्रजातियों के भारतीय स्थानीय पक्षियों को हर वर्ष देखा जा सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय पक्षी सफेद सारस (साइबेरियन क्रेन) यहाँ सर्दियों के महिने में निवास करते हैं। हंस, शक, सारिका, चकवा-चकवी, लोह, सारस, कोयल, धनेष तथा राष्ट्रीय पक्षी मोर यहाँ आसानी से देखे जा सकते हैं। जाड़ों में यहाँ भ्रमण करना अधिक उपयुक्त माना जाता है।

मुकन्दरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान (घोषित राष्ट्रीय उद्यान)
      पूर्व में इस दर्रा अभयारण्य को अब राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया है, यद्यपि इसकी अन्तिम अधिसूचना जारी होना शेष है। यह कोटा जिले में लगभग 200 वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में विस्तृत है। यहाँ प्रमुख रूप से चीतें, बाघ, सूअर तथा अन्य जंगली जीव एवं विभिन्न प्रकार के पक्षी है। मुकन्दरा की पहाड़ियों में स्थित यह सघन वन से युक्त है।

राष्ट्रीय मरु उद्यान, जैसलमेर
      वर्ष 1981 में जैसलमेर में राष्ट्रीय मरु उद्यान की स्थापना की गई। इसका प्रमुख उद्देश्य इस क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति एवं करोड़ों वर्षों से भूमि के गर्भ में दबे जीवाश्मों को संरक्षण प्रदान करना है। अतः इसे जीवाश्म उद्यान भी कहा जाता है। इसका विस्तार लगभग 3162 वर्ग किमी. क्षेत्र में है, जो जैसलमेर-बाड़मेर जिलों में विस्तृत है। जीवाश्म एवं वनस्पति संरक्षण के अतिरिक्त यहाँ चिंकारा, चौसिंघा, काला हिरण एवं गोडावन को भी संरक्षण प्रदान किया जाता है।

सरिस्का वन्य जीव अभयारण्य (टाइगर प्रोजेक्ट सरिस्का)
      अलवर से 35 किमी. दूर सरिस्का नामक स्थान पर स्वतन्त्रता से पूर्व ही एक पैलेस बनाकर वन्य जीव-अभयारण्य का प्रारम्भ कर दिया गया था। राज्य सरकार ने 1955 में इसे विधिवत अभयारण्य घोषित किया और 1990 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का स्तर दिया गया तथा यहाँ केन्द्र सरकार द्वारा बाघ परियोजना प्रारम्भ की गई। इस वन विहार में शेर, बघेरा, सांभर, चीतल, नीलगाय, जंगली सूअर, काला खरगोश, लंगूर के अतिरिक्त अनेक प्रकार के पक्षी भी निवास करते हैं। सरिस्का के सम्बन्ध में कटु सत्य यह है कि यहाँ के समस्त बाघ समाप्त हो गये थे। पुनः यहाँ बाघों की वृद्धि हेतु रणथम्भौर से कुछ बाघों को स्थान्तरित किया गया है जिससे यहाँ पुनः बाघ संवर्धन हो सके।

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